Hindi Shayri

Sunday, 6 September, 2009

Aa Ki Meri Jaan Ko Karaar Nahi Hai... Mirza Ghalib

आ, के मेरी जान को करार नहीं है,
ताक़त -ए-बेदाद-इंतज़ार नहीं है.

देतें है जन्नत हयात-ए-दहर के बदले,
नश्शा ब अंदाज़-ए-खुमार नहीं है.

गिरिया निकाले तेरी बज़म से मुझको,
हाय ! के रोने पे इख्तियार नहीं है.

हमसे आबस है गुमान-ए-रंजिस-ए-खातिर,
ख़ाक में उश्शार की गुब्बार नहीं है.

तुने कसम मयकशी की खायी है 'ग़ालिब'
तेरी कसम का कुछ एतबार नहीं है...

Mirza Galib

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